Book 2 • Chapter 107
Section 107
10 verses
Verse 1
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे
Verse 2
कंद मूल फल अंकुर नीके दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के
Verse 3
सीय लखन जन सहित सुहाए अति रुचि राम मूल फल खाए
Verse 4
भए बिगतश्रम रामु सुखारे भरव्दाज मृदु बचन उचारे
Verse 5
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू आजु सुफल जप जोग बिरागू
Verse 6
सफल सकल सुभ साधन साजू राम तुम्हहि अवलोकत आजू
Verse 7
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी तुम्हारें दरस आस सब पूजी
Verse 8
अब करि कृपा देहु बर एहू निज पद सरसिज सहज सनेहू
Verse 9
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार
Verse 10
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार
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