Book 2 • Chapter 231
Section 231
10 verses
Verse 1
जगु भय मगन गगन भइ बानी लखन बाहुबलु बिपुल बखानी
Verse 2
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा को कहि सकइ को जाननिहारा
Verse 3
अनुचित उचित काजु किछु होऊ समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ
Verse 4
सहसा करि पाछैं पछिताहीं कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं
Verse 5
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने राम सीयँ सादर सनमाने
Verse 6
कही तात तुम्ह नीति सुहाई सब तें कठिन राजमदु भाई
Verse 7
जो अचवँत नृप मातहिं तेई नाहिन साधुसभा जेहिं सेई
Verse 8
सुनहु लखन भल भरत सरीसा बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा
Verse 9
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ
Verse 10
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ
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