Book 1 • Chapter 100
Section 100
8 verses
Verse 1
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे सबहि जथोचित आसन दीन्हे
Verse 2
बेदी बेद बिधान सँवारी सुभग सुमंगल गावहिं नारी
Verse 3
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा जाइ न बरनि बिरंचि बनावा
Verse 4
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई
Verse 5
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई करि सिंगारु सखीं लै आई
Verse 6
देखत रूपु सकल सुर मोहे बरनै छबि अस जग कबि को है
Verse 7
जगदंबिका जानि भव भामा सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा
Verse 8
सुंदरता मरजाद भवानी जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी
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