Book 1 • Chapter 128
Section 128
10 verses
Verse 1
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई करै अन्यथा अस नहिं कोई
Verse 2
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए तब बिरंचि के लोक सिधाए
Verse 3
एक बार करतल बर बीना गावत हरि गुन गान प्रबीना
Verse 4
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा
Verse 5
हरषि मिले उठि रमानिकेता बैठे आसन रिषिहि समेता
Verse 6
बोले बिहसि चराचर राया बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया
Verse 7
काम चरित नारद सब भाषे जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे
Verse 8
अति प्रचंड रघुपति कै माया जेहि न मोह अस को जग जाया
Verse 9
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान
Verse 10
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान
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