Book 6 • Chapter 32
Section 32
14 verses
Verse 1
जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा
Verse 2
हरि हर निंदा सुनइ जो काना होइ पाप गोघात समाना
Verse 3
कटकटान कपिकुंजर भारी दुहु भुजदंड तमकि महि मारी
Verse 4
डोलत धरनि सभासद खसे चले भाजि भय मारुत ग्रसे
Verse 5
गिरत सँभारि उठा दसकंधर भूतल परे मुकुट अति सुंदर
Verse 6
कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे कछु अंगद प्रभु पास पबारे
Verse 7
आवत मुकुट देखि कपि भागे दिनहीं लूक परन बिधि लागे
Verse 8
की रावन करि कोप चलाए कुलिस चारि आवत अति धाए
Verse 9
कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू लूक न असनि केतु नहिं राहू
Verse 10
ए किरीट दसकंधर केरे आवत बालितनय के प्रेरे
Verse 11
तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास
Verse 12
कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास 32(क)
Verse 13
उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ
Verse 14
धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ 32(ख)
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