Book 6 • Chapter 84
Section 84
8 verses
Verse 1
जानु टेकि कपि भूमि न गिरा उठा सँभारि बहुत रिस भरा
Verse 2
मुठिका एक ताहि कपि मारा परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा
Verse 3
मुरुछा गै बहोरि सो जागा कपि बल बिपुल सराहन लागा
Verse 4
धिग धिग मम पौरुष धिग मोही जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही
Verse 5
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो देखि दसानन बिसमय पायो
Verse 6
कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता
Verse 7
सुनत बचन उठि बैठ कृपाला गई गगन सो सकति कराला
Verse 8
पुनि कोदंड बान गहि धाए रिपु सन्मुख अति आतुर आए
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