Book 5 • Chapter 17
Section 17
11 verses
Verse 1
मन संतोष सुनत कपि बानी भगति प्रताप तेज बल सानी
Verse 2
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना होहु तात बल सील निधाना
Verse 3
अजर अमर गुननिधि सुत होहू करहुँ बहुत रघुनायक छोहू
Verse 4
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना निर्भर प्रेम मगन हनुमाना
Verse 5
बार बार नाएसि पद सीसा बोला बचन जोरि कर कीसा
Verse 6
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता आसिष तव अमोघ बिख्याता
Verse 7
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा लागि देखि सुंदर फल रूखा
Verse 8
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी परम सुभट रजनीचर भारी
Verse 9
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं
Verse 10
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु
Verse 11
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु
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