Book 5 • Chapter 31
Section 31
11 verses
Verse 1
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही
Verse 2
नाथ जुगल लोचन भरि बारी बचन कहे कछु जनककुमारी
Verse 3
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना दीन बंधु प्रनतारति हरना
Verse 4
मन क्रम बचन चरन अनुरागी केहि अपराध नाथ हौं त्यागी
Verse 5
अवगुन एक मोर मैं माना बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना
Verse 6
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा
Verse 7
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा स्वास जरइ छन माहिं सरीरा
Verse 8
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी जरैं न पाव देह बिरहागी
Verse 9
सीता के अति बिपति बिसाला बिनहिं कहें भलि दीनदयाला
Verse 10
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति
Verse 11
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति
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