Book 7 • Chapter 54
Section 54
8 verses
Verse 1
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी
Verse 2
धर्मसील कोटिक महँ कोई बिषय बिमुख बिराग रत होई
Verse 3
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई
Verse 4
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ
Verse 5
तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी
Verse 6
धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी
Verse 7
सब ते सो दुर्लभ सुरराया राम भगति रत गत मद माया
Verse 8
सो हरिभगति काग किमि पाई बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई
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