Book 3 • Chapter 1
Section 1
10 verses
Verse 1
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई मति अनुरूप अनूप सुहाई
Verse 2
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन करत जे बन सुर नर मुनि भावन
Verse 3
एक बार चुनि कुसुम सुहाए निज कर भूषन राम बनाए
Verse 4
सीतहि पहिराए प्रभु सादर बैठे फटिक सिला पर सुंदर
Verse 5
सुरपति सुत धरि बायस बेषा सठ चाहत रघुपति बल देखा
Verse 6
जिमि पिपीलिका सागर थाहा महा मंदमति पावन चाहा
Verse 7
सीता चरन चौंच हति भागा मूढ़ मंदमति कारन कागा
Verse 8
चला रुधिर रघुनायक जाना सींक धनुष सायक संधाना
Verse 9
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह
Verse 10
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह
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