Book 3 • Chapter 10
Section 10
26 verses
Verse 1
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना नाम सुतीछन रति भगवाना
Verse 2
मन क्रम बचन राम पद सेवक सपनेहुँ आन भरोस न देवक
Verse 3
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा करत मनोरथ आतुर धावा
Verse 4
हे बिधि दीनबंधु रघुराया मो से सठ पर करिहहिं दाया
Verse 5
सहित अनुज मोहि राम गोसाई मिलिहहिं निज सेवक की नाई
Verse 6
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं भगति बिरति न ग्यान मन माहीं
Verse 7
नहिं सतसंग जोग जप जागा नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा
Verse 8
एक बानि करुनानिधान की सो प्रिय जाकें गति न आन की
Verse 9
होइहैं सुफल आजु मम लोचन देखि बदन पंकज भव मोचन
Verse 10
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी कहि न जाइ सो दसा भवानी
Verse 11
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा
Verse 12
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई
Verse 13
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई
Verse 14
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा
Verse 15
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा पुलक सरीर पनस फल जैसा
Verse 16
तब रघुनाथ निकट चलि आए देखि दसा निज जन मन भाए
Verse 17
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा जाग न ध्यानजनित सुख पावा
Verse 18
भूप रूप तब राम दुरावा हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा
Verse 19
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें बिकल हीन मनि फनि बर जैसें
Verse 20
आगें देखि राम तन स्यामा सीता अनुज सहित सुख धामा
Verse 21
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी
Verse 22
भुज बिसाल गहि लिए उठाई परम प्रीति राखे उर लाई
Verse 23
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला कनक तरुहि जनु भेंट तमाला
Verse 24
राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा
Verse 25
तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार
Verse 26
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार
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