Book 3 • Chapter 13
Section 13
20 verses
Verse 1
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही
Verse 2
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ ताते तात न कहि समुझायउँ
Verse 3
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही
Verse 4
मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी पूछेहु नाथ मोहि का जानी
Verse 5
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी
Verse 6
ऊमरि तरु बिसाल तव माया फल ब्रह्मांड अनेक निकाया
Verse 7
जीव चराचर जंतु समाना भीतर बसहि न जानहिं आना
Verse 8
ते फल भच्छक कठिन कराला तव भयँ डरत सदा सोउ काला
Verse 9
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं
Verse 10
यह बर मागउँ कृपानिकेता बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता
Verse 11
अबिरल भगति बिरति सतसंगा चरन सरोरुह प्रीति अभंगा
Verse 12
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता
Verse 13
अस तव रूप बखानउँ जानउँ फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ
Verse 14
संतत दासन्ह देहु बड़ाई तातें मोहि पूँछेहु रघुराई
Verse 15
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ पावन पंचबटी तेहि नाऊँ
Verse 16
दंडक बन पुनीत प्रभु करहू उग्र साप मुनिबर कर हरहू
Verse 17
बास करहु तहँ रघुकुल राया कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया
Verse 18
चले राम मुनि आयसु पाई तुरतहिं पंचबटी निअराई
Verse 19
गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ
Verse 20
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ
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