Book 3 • Chapter 12
Section 12
15 verses
Verse 1
एवमस्तु करि रमानिवासा हरषि चले कुभंज रिषि पासा
Verse 2
बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ भए मोहि एहिं आश्रम आएँ
Verse 3
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं
Verse 4
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई लिए संग बिहसै द्वौ भाई
Verse 5
पंथ कहत निज भगति अनूपा मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा
Verse 6
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ करि दंडवत कहत अस भयऊ
Verse 7
नाथ कौसलाधीस कुमारा आए मिलन जगत आधारा
Verse 8
राम अनुज समेत बैदेही निसि दिनु देव जपत हहु जेही
Verse 9
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए हरि बिलोकि लोचन जल छाए
Verse 10
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई रिषि अति प्रीति लिए उर लाई
Verse 11
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी आसन बर बैठारे आनी
Verse 12
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा
Verse 13
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा हरषे सब बिलोकि सुखकंदा
Verse 14
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर
Verse 15
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर
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