Book 3 • Chapter 17
Section 17
22 verses
Verse 1
भगति जोग सुनि अति सुख पावा लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा
Verse 2
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती कहत बिराग ग्यान गुन नीती
Verse 3
सूपनखा रावन कै बहिनी दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी
Verse 4
पंचबटी सो गइ एक बारा देखि बिकल भइ जुगल कुमारा
Verse 5
भ्राता पिता पुत्र उरगारी पुरुष मनोहर निरखत नारी
Verse 6
होइ बिकल सक मनहि न रोकी जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी
Verse 7
रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई बोली बचन बहुत मुसुकाई
Verse 8
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी यह सँजोग बिधि रचा बिचारी
Verse 9
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं
Verse 10
ताते अब लगि रहिउँ कुमारी मनु माना कछु तुम्हहि निहारी
Verse 11
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता अहइ कुआर मोर लघु भ्राता
Verse 12
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी
Verse 13
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा पराधीन नहिं तोर सुपासा
Verse 14
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा जो कछु करहिं उनहि सब छाजा
Verse 15
सेवक सुख चह मान भिखारी ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी
Verse 16
लोभी जसु चह चार गुमानी नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी
Verse 17
पुनि फिरि राम निकट सो आई प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई
Verse 18
लछिमन कहा तोहि सो बरई जो तृन तोरि लाज परिहरई
Verse 19
तब खिसिआनि राम पहिं गई रूप भयंकर प्रगटत भई
Verse 20
सीतहि सभय देखि रघुराई कहा अनुज सन सयन बुझाई
Verse 21
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि
Verse 22
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि
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