Book 3 • Chapter 18
Section 18
13 verses
Verse 1
नाक कान बिनु भइ बिकरारा जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा
Verse 2
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता
Verse 3
तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई जातुधान सुनि सेन बनाई
Verse 4
धाए निसिचर निकर बरूथा जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा
Verse 5
नाना बाहन नानाकारा नानायुध धर घोर अपारा
Verse 6
सुपनखा आगें करि लीनी असुभ रूप श्रुति नासा हीनी
Verse 7
असगुन अमित होहिं भयकारी गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी
Verse 8
गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं देखि कटकु भट अति हरषाहीं
Verse 9
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई
Verse 10
धूरि पूरि नभ मंडल रहा राम बोलाइ अनुज सन कहा
Verse 11
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर आवा निसिचर कटकु भयंकर
Verse 12
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी चले सहित श्री सर धनु पानी
Verse 13
देखि राम रिपुदल चलि आवा बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा
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