Book 3 • Chapter 19
Section 19
14 verses
Verse 1
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी थकित भई रजनीचर धारी
Verse 2
सचिव बोलि बोले खर दूषन यह कोउ नृपबालक नर भूषन
Verse 3
नाग असुर सुर नर मुनि जेते देखे जिते हते हम केते
Verse 4
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई देखी नहिं असि सुंदरताई
Verse 5
जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा बध लायक नहिं पुरुष अनूपा
Verse 6
देहु तुरत निज नारि दुराई जीअत भवन जाहु द्वौ भाई
Verse 7
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु तासु बचन सुनि आतुर आवहु
Verse 8
दूतन्ह कहा राम सन जाई सुनत राम बोले मुसकाई
Verse 9
हम छत्री मृगया बन करहीं तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं
Verse 10
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं एक बार कालहु सन लरहीं
Verse 11
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक मुनि पालक खल सालक बालक
Verse 12
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू समर बिमुख मैं हतउँ न काहू
Verse 13
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई रिपु पर कृपा परम कदराई
Verse 14
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ
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