Book 3 • Chapter 4
Section 4
24 verses
Verse 1
नमामि भक्त वत्सलं कृपालु शील कोमलं
Verse 2
भजामि ते पदांबुजं अकामिनां स्वधामदं
Verse 3
निकाम श्याम सुंदरं भवाम्बुनाथ मंदरं
Verse 4
प्रफुल्ल कंज लोचनं मदादि दोष मोचनं
Verse 5
प्रलंब बाहु विक्रमं प्रभोऽप्रमेय वैभवं
Verse 6
निषंग चाप सायकं धरं त्रिलोक नायकं
Verse 7
दिनेश वंश मंडनं महेश चाप खंडनं
Verse 8
मुनींद्र संत रंजनं सुरारि वृंद भंजनं
Verse 9
मनोज वैरि वंदितं अजादि देव सेवितं
Verse 10
विशुद्ध बोध विग्रहं समस्त दूषणापहं
Verse 11
नमामि इंदिरा पतिं सुखाकरं सतां गतिं
Verse 12
भजे सशक्ति सानुजं शची पतिं प्रियानुजं
Verse 13
त्वदंघ्रि मूल ये नराः भजंति हीन मत्सरा
Verse 14
पतंति नो भवार्णवे वितर्क वीचि संकुले
Verse 15
विविक्त वासिनः सदा भजंति मुक्तये मुदा
Verse 16
निरस्य इंद्रियादिकं प्रयांति ते गतिं स्वकं
Verse 17
तमेकमभ्दुतं प्रभुं निरीहमीश्वरं विभुं
Verse 18
जगद्गुरुं च शाश्वतं तुरीयमेव केवलं
Verse 19
भजामि भाव वल्लभं कुयोगिनां सुदुर्लभं
Verse 20
स्वभक्त कल्प पादपं समं सुसेव्यमन्वहं
Verse 21
अनूप रूप भूपतिं नतोऽहमुर्विजा पतिं
Verse 22
प्रसीद मे नमामि ते पदाब्ज भक्ति देहि मे
Verse 23
पठंति ये स्तवं इदं नरादरेण ते पदं
Verse 24
व्रजंति नात्र संशयं त्वदीय भक्ति संयुता
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