Book 3 • Chapter 5
Section 5
23 verses
Verse 1
अनुसुइया के पद गहि सीता मिली बहोरि सुसील बिनीता
Verse 2
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई आसिष देइ निकट बैठाई
Verse 3
दिब्य बसन भूषन पहिराए जे नित नूतन अमल सुहाए
Verse 4
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी नारिधर्म कछु ब्याज बखानी
Verse 5
मातु पिता भ्राता हितकारी मितप्रद सब सुनु राजकुमारी
Verse 6
अमित दानि भर्ता बयदेही अधम सो नारि जो सेव न तेही
Verse 7
धीरज धर्म मित्र अरु नारी आपद काल परिखिअहिं चारी
Verse 8
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना अधं बधिर क्रोधी अति दीना
Verse 9
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना नारि पाव जमपुर दुख नाना
Verse 10
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा कायँ बचन मन पति पद प्रेमा
Verse 11
जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं बेद पुरान संत सब कहहिं
Verse 12
उत्तम के अस बस मन माहीं सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं
Verse 13
मध्यम परपति देखइ कैसें भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें
Verse 14
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई
Verse 15
बिनु अवसर भय तें रह जोई जानेहु अधम नारि जग सोई
Verse 16
पति बंचक परपति रति करई रौरव नरक कल्प सत परई
Verse 17
छन सुख लागि जनम सत कोटि दुख न समुझ तेहि सम को खोटी
Verse 18
बिनु श्रम नारि परम गति लहई पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई
Verse 19
पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई बिधवा होई पाई तरुनाई
Verse 20
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ
Verse 21
जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय 5(क)
Verse 22
सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि
Verse 23
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित 5(ख)
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