Book 3 • Chapter 45
Section 45
11 verses
Verse 1
सुनि रघुपति के बचन सुहाए मुनि तन पुलक नयन भरि आए
Verse 2
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती सेवक पर ममता अरु प्रीती
Verse 3
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी ग्यान रंक नर मंद अभागी
Verse 4
पुनि सादर बोले मुनि नारद सुनहु राम बिग्यान बिसारद
Verse 5
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा कहहु नाथ भव भंजन भीरा
Verse 6
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ
Verse 7
षट बिकार जित अनघ अकामा अचल अकिंचन सुचि सुखधामा
Verse 8
अमितबोध अनीह मितभोगी सत्यसार कबि कोबिद जोगी
Verse 9
सावधान मानद मदहीना धीर धर्म गति परम प्रबीना
Verse 10
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह
Verse 11
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह
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