Book 3 • Chapter 44
Section 44
10 verses
Verse 1
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता
Verse 2
जप तप नेम जलाश्रय झारी होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी
Verse 3
काम क्रोध मद मत्सर भेका इन्हहि हरषप्रद बरषा एका
Verse 4
दुर्बासना कुमुद समुदाई तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई
Verse 5
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा
Verse 6
पुनि ममता जवास बहुताई पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई
Verse 7
पाप उलूक निकर सुखकारी नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी
Verse 8
बुधि बल सील सत्य सब मीना बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना
Verse 9
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि
Verse 10
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि
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