Book 3 • Chapter 43
Section 43
12 verses
Verse 1
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी पुनि नारद बोले मृदु बानी
Verse 2
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया
Verse 3
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा
Verse 4
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा
Verse 5
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी जिमि बालक राखइ महतारी
Verse 6
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई तहँ राखइ जननी अरगाई
Verse 7
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता
Verse 8
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी बालक सुत सम दास अमानी
Verse 9
जनहि मोर बल निज बल ताही दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही
Verse 10
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं
Verse 11
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि
Verse 12
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि
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