Book 3 • Chapter 42
Section 42
12 verses
Verse 1
सुनहु उदार सहज रघुनायक सुंदर अगम सुगम बर दायक
Verse 2
देहु एक बर मागउँ स्वामी जद्यपि जानत अंतरजामी
Verse 3
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ
Verse 4
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी
Verse 5
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें अस बिस्वास तजहु जनि भोरें
Verse 6
तब नारद बोले हरषाई अस बर मागउँ करउँ ढिठाई
Verse 7
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका श्रुति कह अधिक एक तें एका
Verse 8
राम सकल नामन्ह ते अधिका होउ नाथ अघ खग गन बधिका
Verse 9
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम
Verse 10
अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम 42(क)
Verse 11
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ
Verse 12
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ 42(ख)
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