Book 2 • Chapter 152
Section 152
10 verses
Verse 1
पुरजन परिजन सकल निहोरी तात सुनाएहु बिनती मोरी
Verse 2
सोइ सब भाँति मोर हितकारी जातें रह नरनाहु सुखारी
Verse 3
कहब सँदेसु भरत के आएँ नीति न तजिअ राजपदु पाएँ
Verse 4
पालेहु प्रजहि करम मन बानी सेएहु मातु सकल सम जानी
Verse 5
ओर निबाहेहु भायप भाई करि पितु मातु सुजन सेवकाई
Verse 6
तात भाँति तेहि राखब राऊ सोच मोर जेहिं करै न काऊ
Verse 7
लखन कहे कछु बचन कठोरा बरजि राम पुनि मोहि निहोरा
Verse 8
बार बार निज सपथ देवाई कहबि न तात लखन लरिकाई
Verse 9
कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह
Verse 10
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह
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