Book 2 • Chapter 176
Section 176
8 verses
Verse 1
कौसल्या धरि धीरजु कहई पूत पथ्य गुर आयसु अहई
Verse 2
सो आदरिअ करिअ हित मानी तजिअ बिषादु काल गति जानी
Verse 3
बन रघुपति सुरपति नरनाहू तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू
Verse 4
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा
Verse 5
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई धीरजु धरहु मातु बलि जाई
Verse 6
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू
Verse 7
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु सुने भरत हिय हित जनु चंदनु
Verse 8
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी सील सनेह सरल रस सानी
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