Book 2 • Chapter 175
Section 175
10 verses
Verse 1
अवसि नरेस बचन फुर करहू पालहु प्रजा सोकु परिहरहू
Verse 2
सुरपुर नृप पाइहि परितोषू तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू
Verse 3
बेद बिदित संमत सबही का जेहि पितु देइ सो पावइ टीका
Verse 4
करहु राजु परिहरहु गलानी मानहु मोर बचन हित जानी
Verse 5
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं अनुचित कहब न पंडित केहीं
Verse 6
कौसल्यादि सकल महतारीं तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं
Verse 7
परम तुम्हार राम कर जानिहि सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि
Verse 8
सौंपेहु राजु राम कै आएँ सेवा करेहु सनेह सुहाएँ
Verse 9
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि
Verse 10
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि
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