Book 2 • Chapter 180
Section 180
10 verses
Verse 1
कैकेई भव तनु अनुरागे पाँवर प्रान अघाइ अभागे
Verse 2
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे देखब सुनब बहुत अब आगे
Verse 3
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा
Verse 4
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू
Verse 5
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू कीन्ह कैकेईं सब कर काजू
Verse 6
एहि तें मोर काह अब नीका तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका
Verse 7
कैकई जठर जनमि जग माहीं यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं
Verse 8
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई प्रजा पाँच कत करहु सहाई
Verse 9
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार
Verse 10
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार
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