Book 2 • Chapter 181
Section 181
10 verses
Verse 1
कैकइ सुअन जोगु जग जोई चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई
Verse 2
दसरथ तनय राम लघु भाई दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई
Verse 3
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका राय रजायसु सब कहँ नीका
Verse 4
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही कहहु सुखेन जथा रुचि जेही
Verse 5
मोहि कुमातु समेत बिहाई कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई
Verse 6
मो बिनु को सचराचर माहीं जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं
Verse 7
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू अदिनु मोर नहि दूषन काहू
Verse 8
संसय सील प्रेम बस अहहू सबुइ उचित सब जो कछु कहहू
Verse 9
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि
Verse 10
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि 181
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