Book 2 • Chapter 182
Section 182
10 verses
Verse 1
गुर बिबेक सागर जगु जाना जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना
Verse 2
मो कहँ तिलक साज सज सोऊ भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ
Verse 3
परिहरि रामु सीय जग माहीं कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं
Verse 4
सो मैं सुनब सहब सुखु मानी अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी
Verse 5
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू परलोकहु कर नाहिन सोचू
Verse 6
एकइ उर बस दुसह दवारी मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी
Verse 7
जीवन लाहु लखन भल पावा सबु तजि राम चरन मनु लावा
Verse 8
मोर जनम रघुबर बन लागी झूठ काह पछिताउँ अभागी
Verse 9
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ
Verse 10
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ
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