Book 2 • Chapter 183
Section 183
10 verses
Verse 1
आन उपाउ मोहि नहि सूझा को जिय कै रघुबर बिनु बूझा
Verse 2
एकहिं आँक इहइ मन माहीं प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं
Verse 3
जद्यपि मैं अनभल अपराधी भै मोहि कारन सकल उपाधी
Verse 4
तदपि सरन सनमुख मोहि देखी छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी
Verse 5
सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ कृपा सनेह सदन रघुराऊ
Verse 6
अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा
Verse 7
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी आयसु आसिष देहु सुबानी
Verse 8
जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी आवहिं बहुरि रामु रजधानी
Verse 9
जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस
Verse 10
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस
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