Book 2 • Chapter 184
Section 184
10 verses
Verse 1
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे राम सनेह सुधाँ जनु पागे
Verse 2
लोग बियोग बिषम बिष दागे मंत्र सबीज सुनत जनु जागे
Verse 3
मातु सचिव गुर पुर नर नारी सकल सनेहँ बिकल भए भारी
Verse 4
भरतहि कहहि सराहि सराही राम प्रेम मूरति तनु आही
Verse 5
तात भरत अस काहे न कहहू प्रान समान राम प्रिय अहहू
Verse 6
जो पावँरु अपनी जड़ताई तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई
Verse 7
सो सठु कोटिक पुरुष समेता बसिहि कलप सत नरक निकेता
Verse 8
अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई हरइ गरल दुख दारिद दहई
Verse 9
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह
Verse 10
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह
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