Book 2 • Chapter 185
Section 185
9 verses
Verse 1
भा सब कें मन मोदु न थोरा जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा
Verse 2
चलत प्रात लखि निरनउ नीके भरतु प्रानप्रिय भे सबही के
Verse 3
मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई चले सकल घर बिदा कराई
Verse 4
धन्य भरत जीवनु जग माहीं सीलु सनेहु सराहत जाहीं
Verse 5
कहहि परसपर भा बड़ काजू सकल चलै कर साजहिं साजू
Verse 6
जेहि राखहिं रहु घर रखवारी सो जानइ जनु गरदनि मारी
Verse 7
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू को न चहइ जग जीवन लाहू
Verse 8
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ
Verse 9
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ
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