Book 2 • Chapter 226
Section 226
8 verses
Verse 1
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें गए कोस दुइ दिनकर ढरकें
Verse 2
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें
Verse 3
उहाँ रामु रजनी अवसेषा जागे सीयँ सपन अस देखा
Verse 4
सहित समाज भरत जनु आए नाथ बियोग ताप तन ताए
Verse 5
सकल मलिन मन दीन दुखारी देखीं सासु आन अनुहारी
Verse 6
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन भए सोचबस सोच बिमोचन
Verse 7
लखन सपन यह नीक न होई कठिन कुचाह सुनाइहि कोई
Verse 8
अस कहि बंधु समेत नहाने पूजि पुरारि साधु सनमाने
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