Book 2 • Chapter 225
Section 225
10 verses
Verse 1
मंगल सगुन होहिं सब काहू फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू
Verse 2
भरतहि सहित समाज उछाहू मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू
Verse 3
करत मनोरथ जस जियँ जाके जाहिं सनेह सुराँ सब छाके
Verse 4
सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं बिहबल बचन पेम बस बोलहिं
Verse 5
रामसखाँ तेहि समय देखावा सैल सिरोमनि सहज सुहावा
Verse 6
जासु समीप सरित पय तीरा सीय समेत बसहिं दोउ बीरा
Verse 7
देखि करहिं सब दंड प्रनामा कहि जय जानकि जीवन रामा
Verse 8
प्रेम मगन अस राज समाजू जनु फिरि अवध चले रघुराजू
Verse 9
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु
Verse 10
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु 225
0:000:00
Speed: