Book 2 • Chapter 224
Section 224
10 verses
Verse 1
निज गुन सहित राम गुन गाथा सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा
Verse 2
तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा
Verse 3
मनहीं मन मागहिं बरु एहू सीय राम पद पदुम सनेहू
Verse 4
मिलहिं किरात कोल बनबासी बैखानस बटु जती उदासी
Verse 5
करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही केहि बन लखनु रामु बैदेही
Verse 6
ते प्रभु समाचार सब कहहीं भरतहि देखि जनम फलु लहहीं
Verse 7
जे जन कहहिं कुसल हम देखे ते प्रिय राम लखन सम लेखे
Verse 8
एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी सुनत राम बनबास कहानी
Verse 9
तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ
Verse 10
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ
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