Book 2 • Chapter 223
Section 223
10 verses
Verse 1
भायप भगति भरत आचरनू कहत सुनत दुख दूषन हरनू
Verse 2
जो कछु कहब थोर सखि सोई राम बंधु अस काहे न होई
Verse 3
हम सब सानुज भरतहि देखें भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें
Verse 4
सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं
Verse 5
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन
Verse 6
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी लघु तिय कुल करतूति मलीनी
Verse 7
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा
Verse 8
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा जनु मरुभूमि कलपतरु जामा
Verse 9
भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु
Verse 10
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु
0:000:00
Speed: