Book 2 • Chapter 229
Section 229
10 verses
Verse 1
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू केहि न राजमद दीन्ह कलंकू
Verse 2
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ रिपु रिन रंच न राखब काऊ
Verse 3
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई निदरे रामु जानि असहाई
Verse 4
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी समर सरोष राम मुखु पेखी
Verse 5
एतना कहत नीति रस भूला रन रस बिटपु पुलक मिस फूला
Verse 6
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी बोले सत्य सहज बलु भाषी
Verse 7
अनुचित नाथ न मानब मोरा भरत हमहि उपचार न थोरा
Verse 8
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें नाथ साथ धनु हाथ हमारें
Verse 9
छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान
Verse 10
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान
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