Book 2 • Chapter 233
Section 233
10 verses
Verse 1
जौं न होत जग जनम भरत को सकल धरम धुर धरनि धरत को
Verse 2
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा
Verse 3
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी
Verse 4
इहाँ भरतु सब सहित सहाए मंदाकिनीं पुनीत नहाए
Verse 5
सरित समीप राखि सब लोगा मागि मातु गुर सचिव नियोगा
Verse 6
चले भरतु जहँ सिय रघुराई साथ निषादनाथु लघु भाई
Verse 7
समुझि मातु करतब सकुचाहीं करत कुतरक कोटि मन माहीं
Verse 8
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ
Verse 9
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर
Verse 10
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर
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