Book 2 • Chapter 234
Section 234
10 verses
Verse 1
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी जौ सनमानहिं सेवकु मानी
Verse 2
मोरें सरन रामहि की पनही राम सुस्वामि दोसु सब जनही
Verse 3
जग जस भाजन चातक मीना नेम पेम निज निपुन नबीना
Verse 4
अस मन गुनत चले मग जाता सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता
Verse 5
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी चलत भगति बल धीरज धोरी
Verse 6
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ तब पथ परत उताइल पाऊ
Verse 7
भरत दसा तेहि अवसर कैसी जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी
Verse 8
देखि भरत कर सोचु सनेहू भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू
Verse 9
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु
Verse 10
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु
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