Book 2 • Chapter 247
Section 247
10 verses
Verse 1
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं
Verse 2
कहि जग गति मायिक मुनिनाथा कहे कछुक परमारथ गाथा
Verse 3
नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा
Verse 4
मरन हेतु निज नेहु बिचारी भे अति बिकल धीर धुर धारी
Verse 5
कुलिस कठोर सुनत कटु बानी बिलपत लखन सीय सब रानी
Verse 6
सोक बिकल अति सकल समाजू मानहुँ राजु अकाजेउ आजू
Verse 7
मुनिबर बहुरि राम समुझाए सहित समाज सुसरित नहाए
Verse 8
ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा
Verse 9
भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह
Verse 10
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह
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