Book 2 • Chapter 283
Section 283
10 verses
Verse 1
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी सुत सुतबधू देवसरि बारी
Verse 2
राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ सो करि कहउँ सखी सति भाऊ
Verse 3
भरत सील गुन बिनय बड़ाई भायप भगति भरोस भलाई
Verse 4
कहत सारदहु कर मति हीचे सागर सीप कि जाहिं उलीचे
Verse 5
जानउँ सदा भरत कुलदीपा बार बार मोहि कहेउ महीपा
Verse 6
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ
Verse 7
अनुचित आजु कहब अस मोरा सोक सनेहँ सयानप थोरा
Verse 8
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी भईं सनेह बिकल सब रानी
Verse 9
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि
Verse 10
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि
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