Book 2 • Chapter 284
Section 284
10 verses
Verse 1
रानि राय सन अवसरु पाई अपनी भाँति कहब समुझाई
Verse 2
रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन जौं यह मत मानै महीप मन
Verse 3
तौ भल जतनु करब सुबिचारी मोरें सौचु भरत कर भारी
Verse 4
गूढ़ सनेह भरत मन माही रहें नीक मोहि लागत नाहीं
Verse 5
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी सब भइ मगन करुन रस रानी
Verse 6
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि
Verse 7
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ
Verse 8
देबि दंड जुग जामिनि बीती राम मातु सुनी उठी सप्रीती
Verse 9
बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय
Verse 10
हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय
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