Book 2 • Chapter 285
Section 285
10 verses
Verse 1
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता जनकप्रिया गह पाय पुनीता
Verse 2
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी दसरथ घरिनि राम महतारी
Verse 3
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं
Verse 4
सेवकु राउ करम मन बानी सदा सहाय महेसु भवानी
Verse 5
रउरे अंग जोगु जग को है दीप सहाय कि दिनकर सोहै
Verse 6
रामु जाइ बनु करि सुर काजू अचल अवधपुर करिहहिं राजू
Verse 7
अमर नाग नर राम बाहुबल सुख बसिहहिं अपनें अपने थल
Verse 8
यह सब जागबलिक कहि राखा देबि न होइ मुधा मुनि भाषा
Verse 9
अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ
Verse 10
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ
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