Book 2 • Chapter 302
Section 302
10 verses
Verse 1
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू पर अकाज प्रिय आपन काजू
Verse 2
काक समान पाकरिपु रीती छली मलीन कतहुँ न प्रतीती
Verse 3
प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला सो उचाटु सब कें सिर मेला
Verse 4
सुरमायाँ सब लोग बिमोहे राम प्रेम अतिसय न बिछोहे
Verse 5
भय उचाट बस मन थिर नाहीं छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं
Verse 6
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी सरित सिंधु संगम जनु बारी
Verse 7
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं एक एक सन मरमु न कहहीं
Verse 8
लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू सरिस स्वान मघवान जुबानू
Verse 9
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ
Verse 10
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ
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