Book 2 • Chapter 31
Section 31
10 verses
Verse 1
आगें दीखि जरत रिस भारी मनहुँ रोष तरवारि उघारी
Verse 2
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई धरी कूबरीं सान बनाई
Verse 3
लखी महीप कराल कठोरा सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा
Verse 4
बोले राउ कठिन करि छाती बानी सबिनय तासु सोहाती
Verse 5
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती
Verse 6
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी सत्य कहउँ करि संकरू साखी
Verse 7
अवसि दूतु मैं पठइब प्राता ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता
Verse 8
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई देउँ भरत कहुँ राजु बजाई
Verse 9
लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति
Verse 10
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति
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