Book 2 • Chapter 30
Section 30
10 verses
Verse 1
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा देखि कुभाँति कुमति मन माखा
Verse 2
भरतु कि राउर पूत न होहीं आनेहु मोल बेसाहि कि मोही
Verse 3
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें काहे न बोलहु बचनु सँभारे
Verse 4
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं
Verse 5
देन कहेहु अब जनि बरु देहू तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू
Verse 6
सत्य सराहि कहेहु बरु देना जानेहु लेइहि मागि चबेना
Verse 7
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा
Verse 8
अति कटु बचन कहति कैकेई मानहुँ लोन जरे पर देई
Verse 9
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ
Verse 10
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ
0:000:00
Speed: