Book 2 • Chapter 29
Section 29
11 verses
Verse 1
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का देहु एक बर भरतहि टीका
Verse 2
मागउँ दूसर बर कर जोरी पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी
Verse 3
तापस बेष बिसेषि उदासी चौदह बरिस रामु बनबासी
Verse 4
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू
Verse 5
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा जनु सचान बन झपटेउ लावा
Verse 6
बिबरन भयउ निपट नरपालू दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू
Verse 7
माथे हाथ मूदि दोउ लोचन तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन
Verse 8
मोर मनोरथु सुरतरु फूला फरत करिनि जिमि हतेउ समूला
Verse 9
अवध उजारि कीन्हि कैकेईं दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं
Verse 10
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास
Verse 11
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास
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