Book 2 • Chapter 33
Section 33
10 verses
Verse 1
जिऐ मीन बरू बारि बिहीना मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना
Verse 2
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं जीवनु मोर राम बिनु नाहीं
Verse 3
समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना जीवनु राम दरस आधीना
Verse 4
सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई मनहुँ अनल आहुति घृत परई
Verse 5
कहइ करहु किन कोटि उपाया इहाँ न लागिहि राउरि माया
Verse 6
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं
Verse 7
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने राममातु भलि सब पहिचाने
Verse 8
जस कौसिलाँ मोर भल ताका तस फलु उन्हहि देउँ करि साका
Verse 9
होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं
Verse 10
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं
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