Book 2 • Chapter 42
Section 42
10 verses
Verse 1
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु
Verse 2
जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा
Verse 3
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी
Verse 4
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं देखु बिचारि मातु मन माहीं
Verse 5
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी निपट बिकल नरनायकु देखी
Verse 6
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी होति प्रतीति न मोहि महतारी
Verse 7
राउ धीर गुन उदधि अगाधू भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू
Verse 8
जातें मोहि न कहत कछु राऊ मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ
Verse 9
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान
Verse 10
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान
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