Book 2 • Chapter 43
Section 43
10 verses
Verse 1
रहसी रानि राम रुख पाई बोली कपट सनेहु जनाई
Verse 2
सपथ तुम्हार भरत कै आना हेतु न दूसर मै कछु जाना
Verse 3
तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता जननी जनक बंधु सुखदाता
Verse 4
राम सत्य सबु जो कछु कहहू तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू
Verse 5
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई चौथेंपन जेहिं अजसु न होई
Verse 6
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे उचित न तासु निरादरु कीन्हे
Verse 7
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे मगहँ गयादिक तीरथ जैसे
Verse 8
रामहि मातु बचन सब भाए जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए
Verse 9
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह
Verse 10
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह
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