Book 2 • Chapter 45
Section 45
10 verses
Verse 1
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ
Verse 2
सब दुख दुसह सहावहु मोही लोचन ओट रामु जनि होंही
Verse 3
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला पीपर पात सरिस मनु डोला
Verse 4
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी
Verse 5
देस काल अवसर अनुसारी बोले बचन बिनीत बिचारी
Verse 6
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई अनुचितु छमब जानि लरिकाई
Verse 7
अति लघु बात लागि दुखु पावा काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा
Verse 8
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता
Verse 9
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात
Verse 10
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात
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